भविष्य के महल की कमजोर नींव
भविष्य के महल की कमजोर नींव
हम अगर बात करें शिक्षा की जहां तक आम आदमी की समझ होती है तो इसका मतलब होता है कि एक सामान्य विचार रखने वाले या नसमझ विचारों को तराश कर उसे समाज में एक समझदार आदमी के रूप में देखना। पर जो मजाक चल रहा है हमारी शिक्षण पद्धति के साथ क्या वह विचार करने योग्य है या नही, आज लोगों को यह क्यों महसूस हो रहा है कि शिक्षण पद्धति बस चंद प्राइवेट संस्थाओं के हाथ की रोटी है कि वें उसे जैसे चाहे बनाये। और अगर उनको यह सही लग रहा है तो क्या जरूरत है हमारी सरकार को कि वह अरबों रुपये खर्च करके विद्यालय बनवाये, अध्यापकों को मोटी तनख्वाह दे, उनको प्रशिक्षित करे यह आज एक बड़ा सवाल है आज हमारी शिक्षण पद्धति ऐसे लोगों के हाथ में है जिनको यही नही मालूम कि शिक्षा आखिर होती क्या है। हमारे यहां एक कहावत कही जाती है कि अगर मकान मजबूत व ऊँचा बनाना है तो उसकी नींव को मजबूत बनाना हमारा पहला कर्तव्य होना चाहिए। लेकिन हम सीधे तौर पर केवल मकान देखना पसंद करते हैं न कि नींव को।तो हम शुरूआत कर रहे हैं अपने समाज को ऊपर उठाने व सभ्य बनाने में अहम भूमिका निभाने वाली देश की प्राथमिक स्तर की शिक्षा से- प्राथमिक स्तर की शिक्षा को कहा जाता है कि यह नींव होती है। और यह बात हमारे देश के महान वैज्ञानिक व पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत डाॅ ए ़पी ़जे ़अब्दुल कलाम के द्वारा सच भी साबित हो चुकी है कि गांव के एक प्राथमिक विद्यालय से पढ़ा हुआ बच्चा भी देश के सबसे प्रतिष्ठित पद को सुशोभित कर सकता है। लेकिन उसी प्राथमिक शिक्षा की दुर्दशा देखकर कहीं न कहीं खूब सारे सवाल उठते हैं लेकिन उनके जवाब कभी भी आसानी से किसी के समझ में नही आते हैं। अब इसके बारे में सोंचने वाले बुरे हैं या फिर इसके जिम्मेदार, यह भी एक मुद्दा है।
एक बात तो सोंचने वाली है कि आज हमारे देश का एक बहुत बडा़ तबका काफी पढ़ लिख गया है। आरक्षण के लिए, नौकरी के लिए, और हर तरह के व्यक्तिगत व सामजिक मुद्दों के लिए वह तुरत-फुरत बिना समय गंवाए सड़क पर उतर जाता है, सड़क जाम करना, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना, और हर किसी मुद्दे पर बवाल कर अपनी ताकत व सभ्यता का परिचय देता है, वह चिल्ला-चिल्लाकर सबको बताता है कि, आज का युवा है और वह किसी भी प्रकार का अन्याय नही सहेगा, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो क्या आपने कभी ऐसा कुछ सुना है या देखा है कि देश की प्राथमिक शिक्षण पद्धति को दुरुस्त करने के लिए लिए भी कोई आंदोलन हुआ है या फिर कहीं इस मुद्दे को लेकर सड़क जाम की गई हो, किसी जनप्रतिनिधि ने इस पर कोई सुधारात्मक कदम उठाया हो, शायद आपका जवाब नही होगा।
आज हमारी आजादी के 70 साल बीत चुके हैं पर हमारे देश में आज भी प्राथमिक व द्वितीयक स्तर पर हर राज्य की अपनी ढपली अपना राग है, आज भी हमारे देश में केंन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय नही है हम राज्यों के द्वारा बनायी गयी सीढ़ी को चढ़कर सीधे मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंदर आ जाते हैं।और फिर बस संसाधनों का विकास करते रहते हैं। एक बात मन में सवाल पैदा करती है कि जब हम प्राथमिक स्तर पर नींव को मजबूत नही कर पा रहे हैं तो हम संसाधन रूपी मकान किसके लिए विकसित कर रहे हैं। जब तक किसी बच्चे के मन में यह सवाल पैदा नही होगा कि ‘क्यों करना है’ तब तक आप ‘कैसे करना है’ कितना भी सिखा दो कोई फर्क नही पड़ने वाला है।
आज भी हमारे देश की आम जनता जिसके पास इतने पैसे नही हैं कि वह बच्चे का नाम किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में लिखवा सके, सरकार द्वारा प्रदत्त प्राथमिक विद्यालयों में भेज रही है। जबकि प्राइवेट स्कूल्स से ज्यादा सुविधाएं बच्चों को प्राथमिक विद्यालयों में मिल रही हैं (खाना, यूनिफाॅर्म, छात्रवृत्ति आदि)।लेकिन इतनी सारी सुविधाओं के बावजूद उनकी सोंच अभी भी यही है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर खेल खेला जा रहा है। प्राथमिक शिक्षा का स्तर इतना गिरा दिया गया है कि हम आज मजबूर हैं बच्चों को प्राइवेट स्कूल्स में भेजने के लिए, कोचिंग क्लासेस में भेजने के लिए।
आज भी उनकी सोंच को बदल पाने में सरकार और हमारे सामाज का प्रबुद्ध वर्ग नकाम रहा है। आम लोगों की इसी सोंच का फायदा हमारे समाज के कुछ शिक्षा को व्यवसाय बनाने वाले शिक्षा के ठेकेदारों ने उठाया और प्राइवेट स्कूल्स बनाकर लोगों के दिमाग में एक बात घुसेड़ दी कि प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा ही इंजीनियर, डाॅक्टर या फिर आईएएस बन सकता है और सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा चपरासी के सिवा कुछ नही। और इसी बात के लिए वे लोगों से मोटी फीस वसूलते हैं, यूनिफाॅर्म, किताबों का बोझ डालते हैं, बच्चों पर प्रदर्शन अच्छा करने हेतु अनावश्यक दबाव डाला जाता है। रात दिन पढ़ कर भी वे कभी कभार निराशा का भाव झेलते हैं। लेकिन ऐसा क्यूं होता है, इसका कोई साफ सुथरा जवाब नही है।
लेकिन जैसा कहा जाता है कि जब सूर्योदय होना होता, है तो रात काफी गहरी व काली हो जाती है, लेकिन जब सूर्योदय होता है तो अंधेरा मिट जाता है। हमारे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की उच्च न्यायालय ने इस दिशा में कदम उठाया और एक याचिकाकर्ता की रिट पर यह आदेश दिया राज्य में कार्यरत सरकारी अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाए नही तो फीस उनके वेतन से काट ली जाएगी। आदेश आने लोगों को थोड़ी प्रसन्नता तो जरूर हुई कि अगर अधिकारियों के बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ने लगे तो विद्यालयों की सूरत बदल जाएगी और उनके बच्चों के भविष्य को लेकर उठने वाली शंका का शायद समाधान भी मिल जाएगा। लेकिन इस आदेश का कितना पालन होगा इस पर अभी से प्रश्नचिन्ह लगने शुरू हो गये हैं।
भारतीय शिक्षा जिसे हम पुरातन, वैदिक व सांस्कृतिक रूप से देखते थे, आज बहुत ही बदल चुकी है। यह शिक्षा से विद्या और आज व्यवसाय बन चुकी है। तब शिक्षा का मतलब होता था कि गुरू शिष्य को और शिष्य गुरू को परस्पर सम्मान देंगे, लेकिन अज के परिप्रेक्ष्य बदल चुके हैं। आज इसका व्यवसायीकरण कर दिया गया है। आज अधिकतर जगहों पर डिग्रियां सब्जियों के भाव से बिक रही हैं। छात्र अब पढ़ना नही चाह रहे हैं, और शिक्षक भी कहीं न कहीं अपने मूल धर्म से भटकते नजर आ रहे हैं। आज छात्र केवल रट्टा मार कर टाॅप करना चाहते हैं। इन सभी में हम और हमारा समाज भी कम कुसूरवार नही है। हम थोड़ा सा देकर ज्यादा पाने की लालसा में आज अनेकों परेशानियों से जूझ रहे हैं। आज अभिभावक बच्चों को स्कूल भेज कर बस आत्म संतुष्टि करते हैं, उनकी सोंच बदल गयी है। कक्षा एक से लेकर स्नातक व परास्नातक स्तर तक छात्र चंद कोचिंग क्लासेस के अध्यापकों के भरोसे पर लटके रहते हैं। उन्हे उनकी क्लासेस से लगता है कि कोचिंग के रूप में अमृत मिल रहा है। अब प्रश्न यह उठता है कि अगर कोचिंग के ही भरोसे पर पूरी पढ़ाई टिकी है तो फिर इतने बड़े व भव्य स्कूल, काॅलेज, विवि खोलने की क्या जरूरत है। क्यूं हमारी सरकार अरबों, खरबों का बजट खपा रही है।
आज जिस तरह से शिक्षा का व्यवसायीकरण कर दिया गया है, वह सोंचने वाली बात है। उच्च शिक्षा तो आज बदतर स्थिति में जा ही रही है, लेकिन हमारी शिक्षा व विद्या की नींव कही जाने वाली प्राथमिक शिक्षा तो और बदतर स्थिति में हैं। प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में हम आज भी वहीं खड़े हुए हैं, जहां हम आज से पहले खड़े थे। हमने विकास किया पर गुणवत्ता में नही, रट्टा मारने में व्यवसायीकरण करने में, इन सभी हालातों के लिए हम, हमारा समाज, और हमारी सरकार सम्मिलित रूप से जिम्मेदार है। आज अशिक्षित लोग शिक्षित समाज पर हावी हो रहे हैं। हम विकास की बात करते हैं, हर साल सरकार अरबों रुपये का बजट पारित करती है, पर शिक्षा ऐसी विकलांगता की अवस्था में पहुंच चुकी है कि कोई भी दवाई, इलाज उसको सकुशल अपने पैरों पर खड़ा कर पाने में असमर्थ है। लेकिन जैसा कि सदियों से चला आ रहा है कि जब सूर्योदय का समय आता है तो अंधेरा काफी घना हो जाता है। अब हमें भी बस इसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए कि इस घने अंधेरे के बाद सूर्योदय कब तक होगा, कब हमारा समाज शिक्षा का व्यवसायीकरण करना बन्द करेगा। कब हम अपने दायित्वों को समझेंगे कि कोचिंग क्लासेस में रट्टा मारने से हम पास तो हो सकते हैं, डिग्रियां बटोर सकते हैं, लेकिन आज के आधुनिक समाज मे जिस व्यवहारिक शिक्षा की जरूरत है उसकी पूर्ति इस रट्टा मारने से नही हो सकती बल्कि उसके लिए हमें फिर से गुरू शिष्य की परम्परा को अपनाने की जरूरत है।



